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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

भीड़

भीड़ में कुचले जाने से बेहतर है
निकल जाना उस भीड़ से।
चाहे सड़क पर हो 
या दिल में बसे लोगों की।
'कृष्णा'

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

रिश्तों से दूर होकर ज़िन्दा हूँ, सो मुजरिम हूँ।

रिश्तों से दूर होकर ज़िन्दा हूँ, सो मुजरिम हूँ।
काश! उसके लिए जीता, अपने लिए मर जाता।

कल सामने मंज़िल थी, पीछे मेरी आवाज़ें।
चलता तो तुमसे बिछड़ जाता,
रुकता तो मेरा सफ़र छूट जाता।

मैं नज़रबंद गलियों मुस्कुरा रहा था,
बिन मंज़िल पर सफ़र तो किए जा रहा था।

उन गलियों में ख़ुश भले न था 'कृष्णा' , था तो सही!
काश वहीं होता! , एक शाम तो बचा लेता!
एक शाम तो बचा लेता, एक रोज़ तो घर जाता!
'कृष्णा'

रविवार, 11 अप्रैल 2021

बात मन की

जो राह तकूँ, कोई मिल ही जाएगा।
तुम ही बताओ, वह मुझे तुम्हारी तरह चाहेगा?

मेरे अलावा जरूर चाहतों की दरिया लेकर वो आएगा,
मगर तुम ही बताओ, मेरी बातें मेरी नज़रें वह कहाँ से लाएगा?
ज़िन्दगी बहुत लंबी है, कोई किराएदार कभी-भी दस्तक दे देगा,
मकान ख़ाली हुआ है, कोई तो जरूर आएगा।

फूलों पर लगे चारों ओर काँटों सा बिछा हूँ मैं,
तुम्हें छोड़ सबको चुभुंगा,
अगर तुम्हें भी मैं काँटा लगा तो यह काँटा और कहां जाएगा?

काँटों की थाल लिए दीवार बन बैठा हूँ,
देखता हूँ, वो आएगा तो किस रास्ते से आएगा!

साथ तुम्हारे, मैं भी मैं-सा था,
बाद तुम्हारे, ये काँटा मुझे ही चुभ जाएगा।
#Kkpbanaras

बुधवार, 24 मार्च 2021

अधूरा चाँद

जैसे आधा चाँद दिखता है न वैसा ही हूँ मैं, जो बस दिखने में आधा है लेकिन है तो पूरा ही।
बहुत ख़ुश हूँ कि कोई है मेरा, मुझे सिर्फ मुझे समझने वाला।
ये भरम टूट जाना ही इस चाँद को कभी पूरा होकर ठहरने नहीं देता।
सामने ये जो निगाहें झुकी पड़ी हैं
इस चाँद ने थे इनके कभी सदके उतारे।

तेरा हाथ कल तक मेरे हाथ में था,
दिल तेरा धड़कता है अभी दिल में हमारे।

शामों को अब न निकलना घरों से,
दीदार-ए-हुश्न न हो जाए तुम्हारा।
कहीं अब मुलाक़ात हो जाए हमसे,
चुराकर नज़र को मुक़र जाना हमसे।
#kkpbanaras

गुरुवार, 11 मार्च 2021

महाशिवरात्रि

इस धरा में सब गोल है, गोल होना शून्य को भी इंगित करती है। पूरे विश्व के नाथ स्वयं शून्य के स्वामी हैं और हम अपने आप को उसी शून्य से दूर रखने की कोशिश में आदरणीय समझते हैं।
दरअसल शून्य की ओर जाना ही चरम आनन्द का मार्ग है। शिव हम में समाएँ और हम भी शून्य हो जाएँ। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।
#kkpbanaras, kkpbanaras

गुरुवार, 4 मार्च 2021

परोसना आसान नहीं होता।

परोसना आसान नहीं होता, फिर चाहे भोजन हो या भाव। उसे तैयार करना होता है कुछ इस तरीके से कि उपभोग करने वाला संतुष्ट हो जाए।
मेरे दो दशकों के अनुभव कहते हैं कि हम चाहे जैसे भी हों, जिस भी हाल में हों, हमें एक वैयक्तिक कलाकार बनाना होता है खुद को सामने वाले कि ख़ुशी के लिए।
गुलाब की ढकार निकालनी पड़ती है , धतूरे को निगल कर।
यह धतूरा कुछ पल के लिए हमारे अपनों को संतुष्ट तो कर देता है परन्तु यही एक कारण बनता है ख़ुद को बर्बाद करने का।
बस यही एक स्थिति का रूप ले लेती है कि हम रिश्तों से दूर होने लगते हैं या कहलो हर शख्स पर विश्वास खोने लगते हैं। बस ख़ुद के मुरीद ही बनने पर मजबूर हो जाते हैं। यही स्थिति एक सीधे और सुलझे धागे में गाँठ जड़ने लगती है, जो विकराल रूप लेकर पूर्व सिंचित प्रेम और भाव के धागे को तोड़ देती है।
#KKPBANARAS

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

वीर सावरकर

काल स्वयं मुझ से डरा है, 
मैं काल से नहीं, 

मैं बार-बार लौट आया हूँ, 
और फिर भी मैं जीवित हूँ। 
हारी मृत्यु है, मैं नहीं।
- वीर सावरकर

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

बनारस love

"पल हर पल मुझे झकझोरे रखता है, मेरे साथ मेरा कलम भी जीता है।"
नवम्बर की शाम वाली ठण्ड में रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में लगी कुर्सियाँ रेलगाड़ी की प्रतीक्षा को सहज बनाने में कारगर लग रही थीं। आदतन मोबाइल उठाया और व्हाट्सएप्प किया "मैं आज ही वापिस बनारस आ रहा हूँ।
हालाँकि मैं वहाँ पहुँच कर उससे अचानक मिलना चाहता था।

"अचानक से मिलने वाली खुशियाँ हमारे अंदर के मुस्कान को बाहर निःस्वार्थ रूप से ले आती है।"

रिप्लाई में एक इमोजी आया 🤗। वो जो उस पार से मुझे हर बात पर अपने इमोजी भेज रही थी उसका चेहरा भी एकदम से मुस्काता हुआ इमोजी जैसा ही है। हम दोनों के नाम के अक्षर भले ही बराबर हैं लेकिन करतूत एकदम विपरीत। वो ठहरी एकदम उपद्रवी और मैं एकदम शान्त। कई बार तो जब मैं कुछ सोच रहा होता हूँ तो अचानक कान में फूँक के भाग जाती है और भौंह चढ़ा कर डराओ तो मासूम बच्चे की तरह मुँह बना के खड़ी हो जाती। अब भला कौन ही डाँटे!

सर्दियों में ट्रेनों की चाल में सुस्ती से गुस्सा तो आ ही रहा था लेकिन ये सोच कर भी निश्चिन्त था कि उतनी सुबह ठण्ड में पहुँच कर करूँगा भी क्या?

"पता नहीं अक्सर क्यों ऐसा होता है कि हमें किसी चीज़ का बेसब्री से इंतजार हो तो समय ख़ुद को और विस्तार कर लेती है।"
इस सिकुड़ा देने वाले ठंड में सुकून तो सफ़र खत्म होने के बाद ही मिला। सफ़र के बाद कहना लाज़मी नहीं होगा क्योंकि उससे मिलना, उसमें मिल जाने जैसा था। हफ़्तों बाद के दीदार में मानो स्वयं महादेव के जटा में गँगा आकर लिपट गई हो,कुछ ऐसा प्रतीत हुआ। मैं इन सब में खोया ही था कि उसने भर लिया आलिंगन में।
बस एक शहर को उसके बाशिन्दे से ज्यादा और क्या चाहिए?
मैं चाह कर भी उसे नहीं बता पाता कि तुम अब तुम नहीं रही हो मेरे जीवन में, हम हो चुके हैं। मुझे पता है कि उसे मेरे सारे एहसासों की ख़बर है लेकिन ये शब्दों के जाल फेंकने में मैं कैसे असमर्थ हो गया ये सोचने वाली बात है।
शब्दों की सीमा को देखते हुए मैं ये कहना चाहूँगा कि दूरियाँ ख़त्म हो जाएँगी बस ख़ुद को बनारसी और अपने इश्क़ को बनारस की संज्ञा दो तो।
#KkpBanaRas

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

खूबसूरत

चले जो आंधी वो तिनका तिनका 

बिखरे आसिया, गम नही हैं।


जो तोड़ दे मेरे हौसलो को  

अभी वो तूफाँ उठा नहीं है।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

#kkpbanaras

काश हमारे जज़्बात भी कोई छाप पाता!
काश हमारी फीलिंग्स के कोई स्टेटस बना पाता!
ख़ैर हमको पता है कि तुमसे, तुमसे और तुमसे भी ये न पाएगा।
हमारे ज़हरीले शब्द जीवन रूपी वृक्ष को झुलसाने के परिणाम निकले द्रव ही तो है।
हमने तो कइयों को लिखा है, हमें लिखने वाला कलम बनते-बनते रह गया।
न ही हमें आवश्यकता है किसी के शब्दों की और उसके शब्दों में सिमट जाने की।
#KkpBanaRas

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

फ़क़त दिल

फ़क़त मेरे दिल को मत निचोड़ियेगा,

प्रेम हो  घात हो या हो प्रहार

मेरा किरदार भी ख़ुद में पाक है।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

बनारस से इश्क़।

जल्दबाजी, हड़बड़ी हमें हमसे अलग करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मुझे मिला शहर से लगभग सबकुछ। डिग्री, दोस्त, और एक नई ज़िन्दगी। मेरे अन्दर बनारस शहर के रूप में नहीं इश्क़ के रूप में बसता है लेकिन 27 दिसंबर 2020 की तारीख को मैं अपने इश्क़ रूपी शहर में बिताए 4 वर्षों के बावजूद भी ज्ञात हुआ कि ये तो ऊपरी इश्क़ था लेकिन जब कल सुबह 3 बजे भोर मैं पहुँचा नदेसर से अस्सी की ओर तो मुझे ज्ञात हुआ कि अन्दर का बनारस तो छिपा था अब तक मेरे नज़रों से। इस बनारस को बनारस बनाने में कई ज़िंदगियाँ अपने रस को नीरस करते हैं। अस्सी के सुबह-ऐ-बनारस को 4 वर्ष के सफर के बाद पहली बार अपने नज़रों से  निहार सका । अब इस सफ़र को नई राह मिल गई। ऊपरी बनारस के इश्क़ बाद अब अन्दर के बनारस से इश्क़ हो गया मुझे।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

यादों के पन्ने

मैं आज निकला था यादों के शहर में दौड़ लगाकर जल्द ही वापिस आने को। यादें ही तो हैं जो हमें प्रकाश की वेग से भी अधिक रफ़्तार में अपने इतिहास में तुरंत ले जा पटक देती हैं। तुम्हारे पास भी होंगी कई यादें। कुछ बचपन की नटखटी तो कुछ जवानी के झकझोर देने वाली। कभी तुम भी कुटाये होगे माँ के चप्पल से और कभी तुम भी गुज़रे होगे विरह की आग से।
कुछ यादें तन-मन को झकझोर देती हैं चाहे कितनी भी कोशिश कर लो लेकिन कुछ लम्हों में इनका पारदर्शी होना दुर्निवार (जिसे चाह कर भी न रोक पाओ) हो जाता है।
कितना पारदर्शी था न ,जब हम साथ थे, ये थोड़ी दूरियाँ क्या आईं कि हमारे बीच धुँधलापन समा गया।
आज अपने सारे सामानों को मैं देख रहा था, सोचा कि इनको कोई उचित स्थान दे दूँ अपने नए कमरे में। देखकर सारी यादें मुझे उस दोपहर में ले गई जब तुमने अपने हाथों से इसे समेटा था। बड़ी बारीकी से सजाया था न तुमने इस सामानों को और कहा था कि 'आपसे ये सब नहीं हो पायेगा, आप बस समान इकट्ठा करो मैं पैक कर देती हूँ।' बुद्धू! इसी नाम से पुकारा था न उस दिन!
हाँ मैं हूँ बुद्धू। अब समझ आने लगी चीजें, भाव, रिश्ते और उनके मोल। 
काश कि सब लौट आता! मुझे पता है कि अब ये मुमकिन नहीं है, अगर होता तो तुम कभी न दरकिनार होती। लेकिन ये जो आस होती है न वो एक और हिम्मत दे देती इंतज़ार करने को।
मुझे एक बात बहुत खरोंच रही है। क्या वाक़ई में मैं महज़ एक छलिया हूँ?
सब छलावा था?
इतना होशियार कोई कैसे हो सकता है?
मैं इतना बड़ा खिलाड़ी कैसे बन गया कि परमेश्वर द्वारा रचित जीवन के साथ खेलने में माहिर हो जाऊँ?

सच में अब यादों के शहर को छोड़ कर चला जाऊँगा मीलों दूर, जहाँ न अम्बर का साया हो न ही धरती की गुरुत्वाकर्षण।
क्या ही ज़रूरत है उन हिस्सों को प्रकट करना जो सिर्फ मेरा न होकर तुमसे भी साझा होती हो।

"साझा दुखों की सबसे क्रूर बात यही है, कोई एक जी भरकर रो भी नहीं सकता।"

मैं सबकुछ खुद में ही समेट लेना चाहता हूँ और एक लम्बी यात्रा को निकल जाना चाहता हूँ। शायद वहाँ तक जहाँ सिर्फ मुसाफिरों के लिए जगह हो, कोई यात्री आस-पास भी न भटके।

हम समय को नहीं रोक सकते और न ही वापिस ले जा सकते हैं। अगर ऐसा संभव होता तो मैं वापिस तुम्हारे अंदर के शहर में ज़रूर एक कमरा बसाता, लेकिन इस बार वो किराए का नहीं होता और न ही मैं भटकता मुसाफ़िर होता। बस ख़ुद को कैद रखता उस शहर के गलीचों में।

"किसी शहर में एकदम मन भरने तक नहीं रुकना चाहिए, न ही एक बार में सब देख-समझ लेना चाहिए। सुंदर शहरों में बार-बार लौटकर आ सकने की वज़ह हर बार बचाकर ले आनी चाहिए अपने साथ…"

अगर जो सम्भव हो पाया तुम्हारे शहर में लौट आना, मुझे मिल जाए नागरिकता वहाँ की तो मैं इस बार अपना बस्ता भी साथ नहीं लाऊँगा। वीरान रखूँगा अपने कमरे को ताकि जब भी तुम भटकते यहाँ पहुँचो तो सजा दो इन्हें अपने मखमली हाथों से। न ही कोई आस लेकर और ही कोई ख़ास लेकर, मैं अकेला आऊँगा सिर्फ अपने आप को लेकर। सुना है बोझ जितना कम होता है सफ़र का मज़ा उतना अधिक आता है।

"अकेले यात्रा करने में सबसे बड़ी सरलता यही है कि हम जब जैसा चाहें, जितना चाहें उतना एकांत अपने लिए बचा सकते हैं।"
इंतज़ार है उस शहर के बुलावे का, जहाँ के पतझड़ भी यहाँ के वसन्त से हसीन होते हैं।

"तुम्हारा कृष्णा"
#KkpBanaRas

सोमवार, 16 नवंबर 2020

छठ महापर्व

हम ज़िन्दगी के किरायेदार हैं और फिलहाल बनारस ही ओढ़ना-बिछौना है हमारा। इसी ज़िन्दगी को बड़े ही आकांक्षाओं के साथ 10/10 के कमरे में घर्षित कर रहै हैं। ज़रूरी भी है क्योंकि कहते हैं कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना पडबे करता है। अब देख ही लीजिए आदमी अपना जन्मदिन भूल सकता है लेकिन 2020 जीते जी तो नहिए भूल पाएगा। ई जो साल चल रहा है ई होली के रंग से लेकर दशहरा और दीवाली के रंग तो फीका कर ही गया। सारे तीज-त्योहार घर-परिवार से 400 किलोमीटर दूर सिमट गया। लेकिन अब कैसे रहा जा सकता है, मन को कैसे मनाया जा सकता है? ई बार कोई बहाना से खुद को फुसला नहीं पाएँगे। बात ई है न कि अब जो आ रहा है ऊ केवल पर्व और परम्परा नहीं हमारा इमोशन है। आप समझ गए होंगे कि हम छठ की बात कर रहे हैं। बड़ी मशक्कत से हम घर पहुँच ही गए हैं, बात ई है न कि ई जो छठ महापर्व है न ई हमलोग को वर्षों से घर-परिवार और साक्षात दृश्य देव एवं प्रकृति से जोड़े हुए रखता है। अब जो घर पहुँच ही गए हैं तब शान्ति प्रेम और सम्पूर्ण रूप से स्वच्छता के प्रतीक रूपी इस महापर्व में ही होली, दशहरा और दीवाली के रंग को ज़रूर मन में भर लेंगे और प्रेम और सौहार्द से सबको रंगीन कर देंगे। मन को इतना हरा-भरा कर देंगे कि उसका सारा कसर पूरा हो जाए, आखिर साल भर फुसलाये रखे थे उसको। एगो बात बताना भूल गए थे कि अब जोर-शोर से छठ की तैयारी शुरू हो चुकी है। भईया तनिको आराम नहीं मिलता है ई पर्व में लेकिन ऊर्जा भी भरपूर मिलता है इसमें। अब आप ही देख लीजिए कि दादी 3 दिन निर्जला व्रत रखती है फिर भी दिन भर लगले रहती है। कहते हैं न समस्त ऊर्जा के देव स्वयं भगवान भाष्कर ही तो हैं। आपसे आग्रह है कि खुद को भी सुरक्षित रखें और अपने अनमोल चहेता जन को भी सुरक्षित रखें।

#kkpbanaras

डिअर दिसंबर

ये दिसंबर तो अब तलक रुका है तुमने ही साथ छोड़ दिया! शायद प्रेम का ताल सूख गया होगा पर वक़्त से पहले कैसे? हो सकता है अश्रुओं के ताल मौसमी रिवा...