सफ़र के रास्ते जितने कठिन होंगे, मंज़िल उतनी शानदार होगी। हाँ! रुकना मत, चलते रहो, चलते रहो मुसलसल। Twitter @kkpbanaras
सोमवार, 28 दिसंबर 2020
बनारस से इश्क़।
जल्दबाजी, हड़बड़ी हमें हमसे अलग करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मुझे मिला शहर से लगभग सबकुछ। डिग्री, दोस्त, और एक नई ज़िन्दगी। मेरे अन्दर बनारस शहर के रूप में नहीं इश्क़ के रूप में बसता है लेकिन 27 दिसंबर 2020 की तारीख को मैं अपने इश्क़ रूपी शहर में बिताए 4 वर्षों के बावजूद भी ज्ञात हुआ कि ये तो ऊपरी इश्क़ था लेकिन जब कल सुबह 3 बजे भोर मैं पहुँचा नदेसर से अस्सी की ओर तो मुझे ज्ञात हुआ कि अन्दर का बनारस तो छिपा था अब तक मेरे नज़रों से। इस बनारस को बनारस बनाने में कई ज़िंदगियाँ अपने रस को नीरस करते हैं। अस्सी के सुबह-ऐ-बनारस को 4 वर्ष के सफर के बाद पहली बार अपने नज़रों से निहार सका । अब इस सफ़र को नई राह मिल गई। ऊपरी बनारस के इश्क़ बाद अब अन्दर के बनारस से इश्क़ हो गया मुझे।
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