बचपन में बचपना का त्याग, किशोरावस्था में मित्र का त्याग और युवावस्था में प्रेम का त्याग। मनोविज्ञान के पास फिर भी व्यवहार बचा रह गया किन्तु मैं कुछ भी न सँजो सका।
सफ़र के रास्ते जितने कठिन होंगे, मंज़िल उतनी शानदार होगी। हाँ! रुकना मत, चलते रहो, चलते रहो मुसलसल। Twitter @kkpbanaras
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डिअर दिसंबर
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