"कृष्णा"
सफ़र के रास्ते जितने कठिन होंगे, मंज़िल उतनी शानदार होगी। हाँ! रुकना मत, चलते रहो, चलते रहो मुसलसल। Twitter @kkpbanaras
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
डिअर दिसंबर
ये दिसंबर तो अब तलक रुका है तुमने ही साथ छोड़ दिया! शायद प्रेम का ताल सूख गया होगा पर वक़्त से पहले कैसे? हो सकता है अश्रुओं के ताल मौसमी रिवा...
-
बचपन की साइंस और बाद को जियोग्राफी न पढ़ा होता तो बेशक़ आज कहता कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर नहीं घूम रही है। दरअसल काले अक्षरों से परे भी एक द...
-
जश्न का दिन है, सत्ता वालों कुछ मीठा खिलाते क्यों नहीं? गिनती बढ़ रही, आँखें चढ़ रही हैं, तुम लखनऊ-बनारस में हो! कहकर मुस्कुराते क्यों नहीं? आ...
-
ये दिसंबर तो अब तलक रुका है तुमने ही साथ छोड़ दिया! शायद प्रेम का ताल सूख गया होगा पर वक़्त से पहले कैसे? हो सकता है अश्रुओं के ताल मौसमी रिवा...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें